
छठ पूजा 2026: डेट और अर्घ्य का समय
| तारीख | रविवार, 15 नवंबर 2026 |
|---|---|
| नहाय खाय | शुक्रवार, 13 नवंबर |
| खरना सूर्यास्त, 14 नवंबर | शाम 4:57 |
| संध्या अर्घ्य (सूर्यास्त), 15 नवंबर | शाम 4:57 |
| उषा अर्घ्य (सूर्योदय), 16 नवंबर | सुबह 6:11 |
समय पटना के लिए IST में हैं।
सूर्योदय और सूर्यास्त का समय शहर के अनुसार बदलता है; पश्चिम के शहरों में ये बाद में होते हैं।
इस पेज पर: छठ पूजा का महत्व · छठ पूजा की कथा · घाट पर या घर पर छठ पूजा कैसे करें · छठ पूजा सामग्री · क्षेत्रीय परंपराएँ · छठ के चार दिन · छठ का प्रसाद: ठेकुआ और बाकी चढ़ावा · व्रत के नियम · छठ पूजा की तिथियाँ · अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छठ पूजा का महत्व
छठ सूर्य देव का व्रत है। व्रती सूर्य देव की उपासना करते हैं, जिन्हें हर भक्त जल पर उगते और डूबते देखता है, और उनके साथ छठी मैया की, जिन्हें षष्ठी देवी भी कहते हैं। दोनों नाम षष्ठी, यानी छठी तिथि से आए हैं: छठ का मुख्य दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी है, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की छठी तिथि।
छठी मैया को लेकर परिवारों में एक से अधिक मान्यताएँ हैं। लोक मान्यता में वे सूर्य देव की बहन हैं। पुराणों में षष्ठी देवी को प्रकृति का छठा अंश कहा गया है, जिनका दूसरा नाम देवसेना है और जो नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों की रक्षा करती हैं। कुछ मान्यताएँ उन्हें भोर की देवी उषा से जोड़ती हैं, और सूर्यास्त के समय प्रत्यूषा को नमन करती हैं, जिन्हें इन मान्यताओं में सांझ की अंतिम किरण माना जाता है। ये सभी परंपराएँ साथ-साथ चलती हैं।
दोनों अर्घ्य का अपना महत्व है, और बहुत से लोग इन्हें इस तरह समझाते हैं। डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती बीते दिन और बीते मौसम के लिए धन्यवाद देते हैं। उगते सूर्य को अर्घ्य देकर आने वाले समय में संतान और परिवार के स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना करते हैं। छठ धान की कटाई के ठीक बाद आता है, और चढ़ावे का बड़ा हिस्सा खेतों की ताज़ा उपज होती है।
व्रती आमतौर पर संतान और परिवार के लिए प्रार्थना करते हैं, या कोई मन्नत पूरी होने पर उसे निभाने के लिए यह व्रत रखते हैं। चैत्र मास में एक छोटा छठ, चैती छठ, भी मनाया जाता है, पर मुख्य पर्व कार्तिक का छठ ही है।
छठ पूजा की कथा
देवी भागवत पुराण में षष्ठी देवी की कथा आती है। स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत और उनकी रानी मालिनी के कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया, जिसके बाद मालिनी गर्भवती हुईं, पर बालक मृत पैदा हुआ। प्रियव्रत शिशु के शरीर को श्मशान ले गए और शोक में अपने प्राण त्यागने को तैयार हो गए।
तभी एक दिव्य विमान में एक देवी प्रकट हुईं। उन्होंने बताया कि वे ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना हैं, और बच्चों की रक्षा करने वाली षष्ठी देवी हैं। उन्होंने बालक को गोद में लिया और उसे जीवित कर दिया। बदले में उन्होंने राजा से अपनी पूजा का प्रचार करने को कहा, और प्रियव्रत ने षष्ठी तिथि को उनकी पूजा आरंभ की। यही ग्रंथ उनकी पूजा को शिशु के जन्म के छठे दिन से भी जोड़ता है।
बिहार में बहुत से लोग छठ को कर्ण से भी जोड़ते हैं, जो सूर्य पुत्र और अंग देश के राजा थे। कहा जाता है कि वे प्रतिदिन जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे। घाट पर व्रती भी इसी तरह जल में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं।
घाट पर या घर पर छठ पूजा कैसे करें
- घर और रसोई की सफ़ाई नहाय खाय से पहले घर, रसोई और घाट तक जाने वाले रास्ते की अच्छी तरह सफ़ाई करें। बहुत से परिवार पर्व का भोजन मिट्टी के चूल्हे पर या केवल छठ के लिए रखे चूल्हे पर बनाते हैं।
- नहाय खाय का स्नान पहले दिन सुबह, पास में नदी या तालाब हो तो वहाँ स्नान करें और थोड़ा जल घर ले आएँ। घर पर स्नान करें तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
- एक समय का सात्विक भोजन घी में लौकी, चने की दाल और भात बनाएँ, बिना प्याज़ और लहसुन के। पहले भोग लगाएँ, फिर व्रती दिन के एकमात्र भोजन के रूप में इसे ग्रहण करें।
- खरना का उपवास दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रखते हैं। बहुत से व्रती यह उपवास बिना जल के भी रखते हैं।
- खरना का प्रसाद सूर्यास्त के बाद रसियाव (गुड़ वाली चावल की खीर) और रोटी बनाएँ, भोग लगाएँ और व्रती प्रसाद ग्रहण करें। फिर यह प्रसाद परिवार और पड़ोसियों में बाँटा जाता है, और इसके बाद व्रती का निर्जला उपवास शुरू होता है।
- प्रसाद बनाना तीसरे दिन स्नान के बाद साफ़ या नए बर्तनों में ठेकुआ और कसार बनाएँ। फल, गन्ना और बाकी चढ़ावा धोकर सजा लें।
- सूप और दउरा सजाना प्रसाद और फल बाँस के सूपों में सजाएँ और उन्हें दउरा (बाँस की गहरी टोकरी) में रखें। व्रती नई, सादी साड़ी पहनती हैं।
- घाट की ओर परिवार छठ के गीत गाते हुए दउरा उठाकर नदी या तालाब तक ले जाता है। कुछ व्रती मन्नत निभाने के लिए पूरे रास्ते ज़मीन पर दंडवत लेटते हुए घाट तक जाते हैं।
- संध्या अर्घ्य ऊपर दिए सूर्यास्त के समय में व्रती जल में सूर्य की ओर मुख करके खड़े होते हैं और एक-एक सूप ऊपर उठाते हैं। परिवार के लोग लोटे से उस पर दूध या जल चढ़ाकर अर्घ्य देते हैं।
- कोसी भरना जिन परिवारों की मन्नत होती है, वे पाँच से सात गन्नों को बाँधकर छत्र बनाते हैं, उसके नीचे चढ़ावा रखते हैं और चारों ओर मिट्टी के दीये जलाते हैं। यह शाम को और फिर भोर से पहले किया जाता है।
- उषा अर्घ्य भोर होने से पहले घाट पर लौटें और ऊपर दिए सूर्योदय के समय तक जल में प्रतीक्षा करें। उगते सूर्य को अर्घ्य दें, फिर घाट पर सबको प्रसाद बाँटें।
- पारण से व्रत खोलना व्रती थोड़ा जल और प्रसाद लेकर व्रत खोलते हैं, और बाकी प्रसाद परिवार, मित्रों और पड़ोसियों में बाँटा जाता है।
छठ पूजा सामग्री
- बाँस के सूप, हर चढ़ावे के लिए एक
- सूप ले जाने के लिए बाँस का दउरा
- अर्घ्य के लिए पीतल या तांबे का लोटा
- अर्घ्य के लिए कच्चा दूध और जल
- गंगाजल
- ठेकुआ
- कसार (चावल का लड्डू)
- पत्तों वाले गन्ने
- साबुत नारियल
- केले
- मौसंबी या नींबू वर्ग का कोई दूसरा मौसमी फल
- मूली और दूसरी मौसमी सब्ज़ियाँ
- पान के पत्ते और सुपारी
- मिट्टी के दीये, घी और रुई की बत्तियाँ
- प्रसाद के लिए गेहूँ का आटा, गुड़ और घी
- खरना के रसियाव के लिए चावल, गुड़ और दूध
- नहाय खाय के लिए लौकी, चने की दाल और चावल
- व्रती के लिए नई साड़ी या धोती
क्षेत्रीय परंपराएँ
- बिहार
- अर्घ्य के दिनों से पहले पटना के गंगा घाट, जैसे गांधी घाट और कलेक्टरेट घाट, साफ़ किए जाते हैं और सजाए जाते हैं। महिलाएँ छठ के गीत गाती हैं, भोजपुरी और मैथिली के वे लोकगीत जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं।
- मिथिला और नेपाल का मधेश
- जनकपुर में यह पर्व गंगा सागर और धनुष सागर जैसे पवित्र तालाबों पर मनाया जाता है, जहाँ किनारों पर लोक कलाकार ढोल और शहनाई बजाते हैं। चढ़ावा तैयार करने से लेकर जल तक जाने तक, हर चरण के साथ गीत गाए जाते हैं। बीरगंज, राजबिराज और काठमांडू में भी छठ मनाया जाता है।
- झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश
- जमशेदपुर में श्रद्धालु वहाँ जुटते हैं जहाँ स्वर्णरेखा और खरकई नदियाँ मिलती हैं। वाराणसी में अर्घ्य गंगा के घाटों पर दिया जाता है, जिनमें अस्सी घाट और दशाश्वमेध घाट भी हैं।
- दिल्ली, मुंबई और कोलकाता
- दिल्ली में पूर्वांचल के परिवार यमुना किनारे आईटीओ और कालिंदी कुंज जैसी जगहों पर अर्घ्य देते हैं। मुंबई में जुहू और दादर चौपाटी पर समुद्र ही नदी का स्थान ले लेता है, और कोलकाता में परिवार हुगली किनारे बाबूघाट जाते हैं।
- विदेश में
- मॉरीशस के भोजपुरी भाषी परिवार, और अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में बसे समुदाय झीलों, नदियों या समुद्र तटों पर इकट्ठा होते हैं। जहाँ पास में जल न हो, वहाँ परिवार घर पर टब या छोटा कुंड भरकर उसमें खड़े होकर अर्घ्य देते हैं।
छठ के चार दिन
- नहाय खाय, यानी "नहाना और खाना": व्रती स्नान करते हैं, घर की सफ़ाई करते हैं और लौकी, दाल और भात का एक सादा भोजन करते हैं। यह तैयारी का दिन है।
- खरना, जिसे लोहंडा भी कहते हैं: दिन भर का उपवास सूर्यास्त के बाद रसियाव और रोटी से खुलता है। यह प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती अंत तक कुछ नहीं लेते, जल भी नहीं।
- संध्या अर्घ्य, जिसे पहला अरग या पहला अर्घ्य भी कहते हैं: सबसे कठिन दिन, जो उपवास और प्रसाद बनाने में बीतता है और सूर्यास्त के समय घाट पर पूरा होता है।
- उषा अर्घ्य, जिसे भोर का अर्घ्य या दूसरा अर्घ्य भी कहते हैं: परिवार भोर से पहले घाट पर लौटता है, उगते सूर्य को अर्घ्य देता है, और व्रती पारण करके व्रत खोलते हैं।
छठ का प्रसाद: ठेकुआ और बाकी चढ़ावा
सूप के बीच में ठेकुआ रहता है। यह गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बना कड़ा, मीठा पकवान है, जिसे लकड़ी के नक्काशीदार साँचे में दबाकर लाल-भूरा होने तक तला जाता है। यह कई दिन तक ख़राब नहीं होता, इसीलिए परिवार इसे घर ले जाते हैं और पर्व के बहुत बाद तक रिश्तेदारों को भेजते रहते हैं।
उसके साथ कसार रहता है, पिसे चावल और गुड़ का लड्डू। खरना का रसियाव वह मीठा है जिसे व्रती निर्जला उपवास शुरू होने से पहले ग्रहण करते हैं। बाकी चढ़ावा मौसम से आता है: गन्ना, नारियल, केले, नींबू वर्ग के फल और कंद-मूल। बहुत से घरों में नया गन्ना तब तक कोई नहीं खाता जब तक वह घाट पर चढ़ न जाए।
व्रत के नियम
- नहाय खाय से पूरा घर केवल सात्विक भोजन करता है: प्याज़, लहसुन, मांस, मछली और मदिरा नहीं।
- व्रती खरना के प्रसाद से लेकर उषा अर्घ्य के बाद पारण तक निर्जला उपवास रखते हैं।
- प्रसाद केवल स्नान के बाद, साफ़ जगह पर, साफ़ या नए बर्तनों में बनता है।
- मिथिला में बहुत सी व्रती पहले दिन नाखून कटवाती हैं।
- कुछ समुदायों में, जिस परिवार ने एक बार छठ शुरू कर दिया, वह इसे हर वर्ष मनाता है और अगली पीढ़ी को सौंपता है।
- अगर आप अस्वस्थ हैं, गर्भवती हैं या बुज़ुर्ग हैं, तो निर्जला उपवास रखने के बजाय किसी व्रती की सहायता करके भी पर्व में भाग ले सकते हैं।
छठ पूजा की तिथियाँ
| दिन | तारीख |
|---|---|
| रविवार | 15 नवंबर 2026 |
| गुरुवार | 4 नवंबर 2027 |
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छठ पूजा 2026 का समय क्या है?
नहाय खाय: शुक्रवार, 13 नवंबर; खरना सूर्यास्त, 14 नवंबर: शाम 4:57; संध्या अर्घ्य (सूर्यास्त), 15 नवंबर: शाम 4:57; उषा अर्घ्य (सूर्योदय), 16 नवंबर: सुबह 6:11। समय पटना के लिए IST में हैं।
छठ पूजा कब है और किस तिथि को मनाई जाती है?
छठ का मुख्य दिन, संध्या अर्घ्य, कार्तिक शुक्ल षष्ठी को होता है। इस वर्ष की सभी तारीख़ें इस पेज के सबसे ऊपर दी गई हैं। नहाय खाय उससे दो दिन पहले होता है, खरना उससे एक दिन पहले, और उषा अर्घ्य अगली सुबह।
छठ पूजा कितने दिन की होती है, कब से कब तक?
छठ चार दिन का पर्व है। पहले दिन नहाय खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन शाम को संध्या अर्घ्य, और चौथे दिन सुबह उषा अर्घ्य के बाद पारण से व्रत पूरा होता है।
छठ में अर्घ्य किस समय दिया जाता है?
संध्या अर्घ्य तीसरे दिन डूबते सूर्य को और उषा अर्घ्य चौथे दिन उगते सूर्य को दिया जाता है। दोनों का समय इस पेज पर ऊपर दिया गया है।
छठी मैया कौन हैं, और सूर्य देव से उनका क्या संबंध है?
परंपराएँ अलग-अलग हैं। लोक मान्यता में वे सूर्य देव की बहन हैं। पुराणों में षष्ठी देवी को प्रकृति का छठा अंश बताया गया है, जिनका दूसरा नाम देवसेना है और जो बच्चों की रक्षा करती हैं। कुछ मान्यताएँ उन्हें भोर की देवी उषा मानती हैं; कुछ उषा और प्रत्यूषा को सूर्य की दो पत्नियाँ बताती हैं, जिन्हें भोर और सांझ में नमन किया जाता है।
छठ का व्रत कितने घंटे का होता है, क्या पानी पी सकते हैं?
मुख्य उपवास लगभग छत्तीस घंटे का होता है, दूसरी शाम खरना के प्रसाद से लेकर भोर के अर्घ्य के बाद पारण तक। यह निर्जला व्रत है, इसलिए इस दौरान व्रती जल भी नहीं लेते। बहुत से व्रती इससे पहले खरना के दिन भी दिन भर उपवास रखते हैं।
छठ पूजा में खरना क्या है?
खरना, जिसे लोहंडा भी कहते हैं, दूसरा दिन है। व्रती दिन भर उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद रसियाव (गुड़ वाली चावल की खीर) और रोटी का भोग लगाकर ग्रहण करते हैं। यह प्रसाद परिवार और पड़ोसियों में बाँटा जाता है, और इसके बाद निर्जला उपवास शुरू होता है।
छठ के सूप में क्या-क्या चढ़ाया जाता है?
हर सूप में आमतौर पर ठेकुआ, कसार, नारियल, केले, नींबू वर्ग के फल, गन्ने के टुकड़े और मौसमी सब्ज़ियाँ होती हैं, साथ में पान का पत्ता। सही सूची परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदलती है।
छठ में डूबते सूर्य की पूजा क्यों होती है?
शाम का अर्घ्य बीते दिन और अभी-अभी कटी फ़सल के लिए सूर्य को धन्यवाद है। भोर का अर्घ्य आने वाले समय के लिए आशीर्वाद माँगता है। कुछ परंपराएँ शाम के अर्घ्य को प्रत्यूषा से और भोर के अर्घ्य को उषा से भी जोड़ती हैं; इन परंपराओं में प्रत्यूषा को सांझ की अंतिम किरण माना जाता है।
दिवाली के कितने दिन बाद छठ पूजा होती है?
छठ दिनों की गिनती से नहीं, चंद्र पंचांग की तिथि से तय होती है। इसका मुख्य दिन, संध्या अर्घ्य, कार्तिक शुक्ल षष्ठी है, यानी दिवाली की अमावस्या के बाद आने वाले कार्तिक शुक्ल पक्ष की छठी तिथि। यह आमतौर पर दिवाली के लगभग एक सप्ताह बाद पड़ती है। इस वर्ष की तारीख़ें इस पेज के सबसे ऊपर हैं। नहाय खाय उससे दो दिन पहले होता है, और उषा अर्घ्य अगली सुबह।
क्या छठ पूजा और रांधण छठ, हल छठ या यमुना छठ एक ही हैं?
नहीं। रांधण छठ गुजरात में शीतला सातम से पहले का रसोई का दिन है, जो श्रावण कृष्ण षष्ठी को पड़ता है। हल छठ, या हल षष्ठी, उसी चंद्र तिथि को होती है, जिसे उत्तर भारत के पंचांग में भाद्रपद में गिना जाता है, और यह बलराम जी के जन्म का पर्व है। यमुना छठ चैत्र में यमुना जी के धरती पर अवतरण की स्मृति में मथुरा और वृंदावन में मनाई जाती है।


