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गोवर्धन पूजा 2026: तिथि और पूजा मुहूर्त

मंगलवार, 10 नवंबर 2026

गोवर्धन पूजा 2026: 9 या 10 नवंबर?

गोवर्धन पूजा 2026 मंगलवार, 10 नवंबर को है। दिल्ली में प्रतिपदा तिथि 10 नवंबर को सूर्योदय के समय रहती है। 9 नवंबर को यह दोपहर 12:32 बजे, सूर्योदय के बाद, आरंभ होती है।

उज्जैन, इंदौर, मुंबई, अहमदाबाद और जयपुर में गोवर्धन पूजा 9 नवंबर की शाम को की जाती है (उज्जैन में दोपहर 3:31 से शाम 5:45 तक), क्योंकि वहाँ 10 नवंबर की सुबह प्रतिपदा कम समय रहती है।

गोवर्धन पूजा के बारे में

गोवर्धन पूजा एक हिंदू त्योहार है, जो भगवान कृष्ण द्वारा वृंदावन के लोगों को मूसलाधार बारिश से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाने की दिव्य लीला का उत्सव मनाता है। भक्त गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं, पारंपरिक भोग तैयार करते हैं और पोषण तथा सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रकृति, मवेशियों और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

गोवर्धन पूजा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है, जो उस दिन की स्मृति में मनाया जाता है जब भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र द्वारा भेजी गई विनाशकारी बारिश से वृंदावन के निवासियों की रक्षा के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया था। यह त्योहार भक्ति, विनम्रता, कृतज्ञता और प्रकृति के सम्मान के महत्व का प्रतीक है। इस अवसर पर, भक्त गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं, अन्नकूट या छप्पन भोग के नाम से जाने जाने वाले विस्तृत भोग तैयार करते हैं और भगवान कृष्ण को समर्पित अनुष्ठान करते हैं। पोषण और समृद्धि के प्रतीक के रूप में गायों और अन्य मवेशियों को भी सजाया और पूजा जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा मानवता, प्रकृति और दिव्य कृपा के बीच संबंध को उजागर करती है।

गोवर्धन पूजा का महत्व

गोवर्धन पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होती है, जो दीपावली का चौथा दिन है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा गोवर्धनधारी के रूप में की जाती है, जिन्होंने ब्रज के गोवर्धन पर्वत को उठाकर अपने गाँव को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। इस पर्व का दूसरा नाम अन्नकूट है, जिसका अर्थ है अन्न का पर्वत। यह नाम उस दिन लगाए जाने वाले विशाल भोग से पड़ा है।

यह पर्व पूजा को आकाश से उतारकर अपने पैरों तले की धरती तक ले आता है। श्रीकृष्ण ने ब्रज के ग्वालों से कहा कि वे हर साल इंद्र के लिए यज्ञ करने के बजाय उस पर्वत, उन गायों और उस धरती का सम्मान करें जो उनका पालन करती है। इसीलिए इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा, गौ पूजा और सबके लिए सामूहिक भोज, तीनों एक साथ होते हैं।

पुष्टिमार्ग, गौड़ीय और स्वामिनारायण परंपराओं में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। ब्रज में, नाथद्वारा में और इस्कॉन तथा स्वामिनारायण मंदिरों में अन्नकूट साल के सबसे बड़े उत्सवों में गिना जाता है।

गोवर्धन पूजा की कथा

श्रीमद्भागवत पुराण में कथा आती है कि ब्रज के ग्वाले हर वर्ष वर्षा के देवता इंद्र के लिए यज्ञ की तैयारी करते थे। बालक कृष्ण ने इस पर प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा कि गायों को घास और गाँव को जल तो गोवर्धन पर्वत देता है, इसलिए पूजा भी गोवर्धन की ही होनी चाहिए।

ब्रजवासी मान गए। इससे क्रोधित होकर इंद्र ने मूसलाधार वर्षा और तूफ़ान भेज दिया। सात दिनों तक श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा। वह पर्वत गाँव के हर परिवार और हर गाय के ऊपर पत्थर के छत्र की तरह तना रहा। अंत में इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ और वर्षा थम गई।

वर्षा थमने पर ब्रजवासियों ने पर्वत को अन्न का बड़ा भोग लगाया। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं पर्वत का रूप धरकर वह भोग स्वीकार किया। आज लगाया जाने वाला अन्नकूट उसी पहले भोग की परंपरा है।

घर पर गोवर्धन पूजा कैसे करें

  1. सुबह तेल लगाकर स्नान दीपावली की बाकी सुबहों की तरह दिन की शुरुआत तेल लगाकर स्नान करने और साफ़ वस्त्र पहनने से करें।
  2. गौ पूजा यदि घर में गाय है तो उसे नहलाकर सजाएँ, उसके सींग रँगें और दिन में बने भोजन का पहला हिस्सा उसे खिलाएँ। गाय न हो तो अपने बनाए भोजन में से कुछ आस-पास की किसी गाय को खिला दें।
  3. गोवर्धन बनाएँ आँगन में या किसी साफ़ पटरे पर गोबर से छोटा गोवर्धन बनाएँ। प्रायः इसे लेटी हुई आकृति के रूप में बनाया जाता है। जो परिवार गोबर का उपयोग नहीं कर सकते, वे पके हुए अन्न या मिठाई से गोवर्धन बना लेते हैं। इसे फूलों, मिट्टी की छोटी गायों, पेड़ों के लिए टहनियों और अपामार्ग (चिरचिटा) की एक टहनी से सजाएँ।
  4. नाभि में कटोरी रखें गोवर्धन की आकृति की नाभि के स्थान पर मिट्टी का एक छोटा दीया या कटोरी रखें। बाद में इसी में तरल भोग अर्पित किए जाएँगे।
  5. अन्नकूट तैयार करें परिवार जितना बना सके, उतना पकाएँ, जैसे चावल, गेहूँ से बने व्यंजन, बेसन की कढ़ी, कोई पत्तेदार साग और मिठाइयाँ। यह भोजन गोवर्धन और श्रीकृष्ण के चित्र के सामने सजाएँ।
  6. गोवर्धन और श्रीकृष्ण की पूजा ऊपर दिए गए शुभ मुहूर्त में जल, चंदन, फूल, धूप और दीप अर्पित करें, फिर तैयार भोजन नैवेद्य के रूप में चढ़ाएँ। नाभि वाली कटोरी में दूध, शहद, दही, बताशे और गंगाजल भरें।
  7. परिक्रमा करें उत्तर भारत के कई घरों में परिवार श्रीकृष्ण का नाम गाते हुए गोवर्धन की सात परिक्रमा करता है। एक व्यक्ति परिक्रमा के रास्ते पर जल की पतली धार गिराता चलता है और दूसरा खील या जौ बिखेरता है।
  8. आरती और प्रसाद गोवर्धन जी की आरती करें। नाभि वाली कटोरी का भोग और अन्नकूट प्रसाद के रूप में परिवार, पड़ोसियों और आने वाले लोगों में बाँटें।
  9. शाम की पूजा कुछ घरों में शाम को राजा बलि की पूजा भी की जाती है। कुछ क्षेत्रों में कारीगर इस दिन अपने औज़ारों और मशीनों के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं।

गोवर्धन पूजा सामग्री

  • गोवर्धन बनाने के लिए गोबर, या पका हुआ अन्न अथवा मिठाई
  • सजावट के लिए मिट्टी की छोटी गायें और टहनियाँ या घास
  • अपामार्ग (चिरचिटा) की एक टहनी
  • नाभि के लिए मिट्टी का छोटा दीया या कटोरी
  • श्रीकृष्ण का चित्र या मूर्ति
  • फूल और मालाएँ
  • चंदन, कुमकुम और अक्षत
  • धूपबत्ती, घी का दीपक और कपूर
  • दूध, दही, शहद, गंगाजल और बताशे
  • परिक्रमा के लिए खील या जौ
  • टोंटी वाला जल का लोटा
  • अन्नकूट के व्यंजन: चावल, गेहूँ के व्यंजन, कढ़ी, पत्तेदार साग और मिठाइयाँ
  • नैवेद्य के लिए तुलसी दल
  • गाय को सजाने के लिए रंग और तेल, यदि घर में गाय हो
  • पान के पत्ते, सुपारी और दक्षिणा

क्षेत्रीय परंपराएँ

ब्रज (मथुरा और वृंदावन)
पके हुए अन्न का ढेर पर्वत के आकार में लगाया जाता है, और अन्नकूट के दिन भारी भीड़ स्वयं गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करती है।
नाथद्वारा और पुष्टिमार्गीय मंदिर
अन्नकूट का भोग लगाने से पहले कई बार ठाकुर जी को दूध से स्नान कराया जाता है और उन्हें भव्य वस्त्र धारण कराए जाते हैं।
स्वामिनारायण मंदिर
अन्नकूट प्रायः साल का सबसे बड़ा उत्सव होता है। संत भोजन को कई स्तरों में सजाते हैं, भक्त हर व्यंजन का वर्णन करने वाले थाल के पद गाते हैं, और आरती के बाद भोग प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है।
इस्कॉन मंदिर
मंदिर की रसोई में हलवे से मीठा गोवर्धन बनाया जाता है, जिसके ऊपर प्रायः गोवर्धन पर्वत की एक पवित्र शिला रखी जाती है। भक्त मंदिर की गायों की पूजा करते हैं, कीर्तन करते हुए इस मीठे पर्वत की परिक्रमा करते हैं और फिर इसे भोज के रूप में बाँटते हैं।
गुजरात
यह दिन गुजराती नव वर्ष होता है। लोग मंदिर जाते हैं और पड़ोसियों को नए साल की शुभकामनाएँ देते हैं।
महाराष्ट्र और कर्नाटक
यह दिन बलि प्रतिपदा के रूप में मनाया जाता है, जिसमें राजा बलि पर भगवान वामन की विजय को याद किया जाता है। कर्नाटक के कई गाँवों में मवेशियों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है।

अन्नकूट

अन्नकूट इस दिन का मुख्य भोग है। ठाकुर जी के सामने व्यंजन कई स्तरों में सजाए जाते हैं। दूध से बनी मिठाइयाँ सबसे पास रखी जाती हैं और नमकीन व्यंजन उनके बाद। बीच में पके अन्न का एक ढेर पर्वत का प्रतीक होता है। पूजा के बाद यह भोजन प्रसाद बन जाता है और इसे जितने अधिक लोगों में हो सके, बाँटा जाता है।

कई मंदिर और परिवार छप्पन भोग, यानी छप्पन व्यंजन तैयार करते हैं। इस संख्या की व्याख्या अलग-अलग परंपराओं में अलग है। एक लोकप्रिय मान्यता है कि श्रीकृष्ण दिन में आठ बार भोजन करते थे और पर्वत उठाए रखने के सात दिनों तक उन्होंने कुछ नहीं खाया। कुछ लोग इसे दिन के आठ प्रहरों से जोड़ते हैं। व्यंजनों की सूची हर मंदिर में अलग होती है, इसलिए नीचे दी गई सूची को केवल मार्गदर्शन मानें। हमारे छप्पन भोग वाले लेख में व्यंजनों का अधिक विस्तार से वर्णन है।

घर पर व्यंजनों की कोई तय संख्या नहीं है। मन से बनाए और श्रद्धा से अर्पित किए गए कुछ व्यंजन भी पूरा अन्नकूट हैं।

  • दूध की मिठाइयाँ और दुग्ध पदार्थ: खीर, रबड़ी, मलाई, मक्खन और दही।
  • मिठाइयाँ: लड्डू, जलेबी, घेवर और रसगुल्ला।
  • अन्न और रोटियाँ: चावल, दाल, खिचड़ी, पूरी, रोटी और कचौड़ी।
  • नमकीन: पकौड़े, भुजिया और पापड़।
  • फल और मेवे: केला, आम, अंगूर, बादाम, काजू और किशमिश।
  • अंत में: चटनी, पान, सुपारी और इलायची।

गोवर्धन परिक्रमा

गोवर्धन मथुरा जिले में वृंदावन के पास एक लंबी, नीची पहाड़ी है। भक्त इस पर्वत को श्रीकृष्ण का ही स्वरूप मानते हैं, और इसकी परिक्रमा ब्रज की सबसे प्रिय साधनाओं में से एक है। अन्नकूट के दिन परिक्रमा मार्ग पर बहुत बड़ी भीड़ उमड़ती है।

मार्ग के अनुसार पूरी परिक्रमा लगभग अठारह से इक्कीस किलोमीटर की होती है। रास्ते में दानघाटी, मानसी गंगा, राधा कुंड, श्याम कुंड और कुसुम सरोवर आते हैं, साथ ही आन्यौर, जतीपुरा और पूंछरी गाँव भी। जतीपुरा के मुखारविंद मंदिर में पर्वत की एक शिला की दूध से पूजा होती है। पैदल परिक्रमा में दिन का अधिकांश समय लगता है, चाल और भीड़ के अनुसार लगभग पाँच से आठ घंटे, और कुछ लोग इसे दो या तीन दिनों में बाँटकर पूरा करते हैं।

परिक्रमा करते समय पर्वत को अपनी दाईं ओर रखा जाता है, जहाँ तक हो सके नंगे पाँव चला जाता है और पर्वत पर चढ़ा नहीं जाता। कुछ भक्त चलते-चलते दूध की अखंड धार चढ़ाते हैं, और सबसे समर्पित भक्त दंडवत परिक्रमा करते हैं, जिसमें एक सप्ताह से अधिक समय लगता है। सुबह जल्दी निकलें, धूप से बचने के लिए सिर ढकें, पानी साथ रखें और पैदल चलना कठिन हो तो ई-रिक्शा ले लें।

गोवर्धन पूजा की तिथियाँ

गोवर्धन पूजा की तिथियाँ
दिनतारीख
मंगलवार10 नवंबर 2026
शनिवार30 अक्टूबर 2027

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोवर्धन पूजा 2026 का समय क्या है?

गोवर्धन पूजा (प्रातःकाल): सुबह 6:43 – सुबह 8:52। समय दिल्ली के लिए IST में हैं।

गोवर्धन पूजा कब और किस तिथि को होती है?

गोवर्धन पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होती है। यह दीपावली का चौथा दिन है।

इंद्र के बजाय गोवर्धन की पूजा क्यों की जाती है?

श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि उनकी गायें, फसलें और जल उसी पर्वत और आस-पास की धरती से मिलते हैं। उन्होंने कहा कि इंद्र के वार्षिक यज्ञ के स्थान पर गोवर्धन का सम्मान करें। जब क्रोधित इंद्र ने तूफ़ान भेजा, तो श्रीकृष्ण ने पर्वत उठाकर सबको तब तक शरण दी, जब तक इंद्र शांत नहीं हो गए।

अन्नकूट का क्या अर्थ है?

अन्नकूट का अर्थ है अन्न का पर्वत। इस दिन गोवर्धन और श्रीकृष्ण को ढेर सारे व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, जिसके बीच में पके अन्न का ढेर पर्वत का प्रतीक होता है। इसी कारण गोवर्धन पूजा को अन्नकूट भी कहते हैं।

अन्नकूट में कितने व्यंजनों का भोग लगता है?

पारंपरिक संख्या छप्पन है, जिसे छप्पन भोग कहते हैं। अलग-अलग परंपराएँ इस संख्या की व्याख्या अलग ढंग से करती हैं। बड़े मंदिरों में कभी-कभी सैकड़ों या हज़ारों व्यंजन भी चढ़ाए जाते हैं। घर पर श्रद्धा से अर्पित किए गए कुछ व्यंजन ही पर्याप्त हैं।

क्या घर पर बिना गोबर के गोवर्धन पूजा की जा सकती है?

हाँ। पके हुए अन्न से, या इस्कॉन मंदिरों की तरह हलवे और मिठाई से बनाया गया गोवर्धन भी मान्य है। पूजा, अन्नकूट और सात परिक्रमा वैसे ही रहती हैं।

घर पर गोवर्धन की कितनी परिक्रमा करें?

उत्तर भारत के कई घरों में श्रीकृष्ण का नाम गाते हुए गोवर्धन की सात परिक्रमा की जाती है। एक व्यक्ति रास्ते पर जल की धार गिराता है और दूसरा खील या जौ बिखेरता है।

क्या गोवर्धन पूजा और बलि प्रतिपदा एक ही हैं?

दोनों एक ही प्रतिपदा को पड़ते हैं, पर इनकी कथाएँ अलग हैं। गोवर्धन पूजा में श्रीकृष्ण के पर्वत उठाने का स्मरण होता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में मनाई जाने वाली बलि प्रतिपदा राजा बलि और भगवान वामन की स्मृति है। कुछ घरों में दोनों मनाए जाते हैं।

गोवर्धन परिक्रमा में कितना समय लगता है?

मार्ग के अनुसार पूरी परिक्रमा लगभग अठारह से इक्कीस किलोमीटर की है, और अधिकतर लोगों को इसमें दिन का बड़ा हिस्सा लग जाता है। दंडवत परिक्रमा में एक सप्ताह से अधिक समय लग सकता है।

गोवर्धन पूजा पर गायों की पूजा क्यों होती है?

श्रीकृष्ण स्वयं ग्वाले थे, और उठाए गए पर्वत के नीचे ब्रज की गायों ने भी ब्रजवासियों के साथ शरण ली थी। किसान परिवार का पालन करने वाली गायों और बैलों का सम्मान इस दिन के अर्थ का हिस्सा है, इसलिए उन्हें सबसे पहले नहलाया, सजाया और खिलाया जाता है।

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