
बलि प्रतिपदा 2026: तिथि और बलि पूजा समय
| तारीख | मंगलवार, 10 नवंबर 2026 |
|---|---|
| बलि पूजा (प्रातःकाल) | सुबह 6:43 – सुबह 8:52 |
समय दिल्ली के लिए IST में हैं।
इस पेज पर: बलि प्रतिपदा का महत्व · बलि प्रतिपदा की कथा · घर पर बलि प्रतिपदा की पूजा कैसे करें · बलि प्रतिपदा पूजा सामग्री · क्षेत्रीय परंपराएँ · कर्नाटक में बलि पाड्यमी · बलि प्रतिपदा, दिवाली पाडवा और गुड़ी पड़वा · बलि की आकृति और रंगोली · बलि प्रतिपदा की तिथियाँ · अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बलि प्रतिपदा 2026: 9 या 10 नवंबर?
बलि प्रतिपदा 2026 मंगलवार, 10 नवंबर को है। दिल्ली में प्रतिपदा तिथि 10 नवंबर को सूर्योदय के समय रहती है। 9 नवंबर को यह दोपहर 12:32 बजे, सूर्योदय के बाद, आरंभ होती है।
बलि प्रतिपदा का महत्व
बलि प्रतिपदा दीपावली का चौथा दिन है। इसे पड़वा, वीरप्रतिपदा और द्यूतप्रतिपदा भी कहा जाता है, और कर्नाटक में यह बलि पाड्यमी के नाम से प्रसिद्ध है। यह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, यानी कार्तिक के शुक्ल पक्ष का पहला दिन होता है। इस दिन असुरराज महाबली का सम्मान किया जाता है, जिन्हें एक दानी और न्यायप्रिय राजा के रूप में याद किया जाता है। मान्यता है कि साल में बस यही एक दिन है जब वे धरती पर लौटते हैं।
यह पर्व बहुत प्राचीन है। पतंजलि के महाभाष्य तक में बलि-कथा के मंचन का उल्लेख मिलता है, और महाभारत, रामायण तथा कई पुराणों में इसके उत्सव का वर्णन है। धर्मसिंधु जैसे ग्रंथ इसे वर्ष के सबसे शुभ दिनों में गिनते हैं। साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में आधा मुहूर्त यही पड़वा माना जाता है।
राजा बलि ने अपना वचन निभाने के लिए अपना सारा राज्य दान कर दिया, और भगवान विष्णु ने उनकी इसी सच्चाई का फल दिया। परिवार उन्हें अपने प्रिय पुराने राजा की तरह घर बुलाते हैं, दीप जलाकर, भोग लगाकर और मिल-जुलकर भोजन करके।
बलि प्रतिपदा की कथा
प्रह्लाद के पौत्र बलि भगवान विष्णु के भक्त थे और उन्होंने देवताओं से तीनों लोक जीत लिए थे। उनका अपना शासन न्यायपूर्ण था, फिर भी उनके आसपास के असुर देवताओं को चैन से नहीं रहने देते थे। इंद्र के नेतृत्व में देवताओं ने विष्णु से कुछ करने की प्रार्थना की, और विष्णु ने ऐसा उपाय चुना जिसमें अपने ही भक्त से युद्ध न करना पड़े।
राजा बलि एक यज्ञ कर रहे थे, जिसमें उन्होंने प्रण लिया था कि किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाएँगे। तभी वामन नाम के एक छोटे ब्राह्मण बालक सामने आए। उन्होंने कहा कि उन्हें बस उतनी भूमि चाहिए जितनी उनके तीन पगों में आ जाए। राजा ने दान दे दिया, और वामन बढ़ते-बढ़ते त्रिविक्रम बन गए, ऐसा विराट रूप जिसके पहले दो पगों में धरती और आकाश समा गए। देने को कुछ न बचा तो बलि ने तीसरे पग के लिए अपना सिर आगे कर दिया, और उस पग ने उन्हें पाताल लोक पहुँचा दिया।
बलि ने अंत तक अपना वचन निभाया था, इसलिए विष्णु ने उन्हें वरदान दिया। हर साल एक दिन के लिए वे अपनी प्रजा के पास लौट सकते हैं और उनकी पूजा स्वीकार कर सकते हैं। आने वाले एक युग में वे इंद्र बनेंगे।
घर पर बलि प्रतिपदा की पूजा कैसे करें
- तेल लगाकर स्नान सुबह जल्दी उठकर तेल लगाकर स्नान करें, जैसा धर्मसिंधु इस दिन के लिए बताता है। नए या धुले हुए वस्त्र पहनें।
- द्वार पर बलि की आकृति बनाएँ घर के मुख्य कक्ष में या द्वार के सामने पाँच रंगों की रंगोली से राजा बलि और उनकी रानी विंध्यावली की आकृति बनाएँ। कुछ परिवार इसके बजाय गोबर या मिट्टी से बलि की मूर्ति बनाते हैं।
- फूलों से सजाएँ आकृति को फूलों से, विशेषकर गेंदे के फूलों से सजाएँ और उसके पास एक दीया जलाएँ।
- बलि का आवाहन और पूजा ऊपर दिए गए बलि पूजा के समय में राजा बलि को अतिथि की तरह आमंत्रित करें। कुमकुम, अक्षत (साबुत चावल) और फूल अर्पित करें, और उनके सामने दही, फल और भोजन रखें।
- गौ पूजा यदि घर में गाय-बैल हैं तो गोशाला साफ़ करें, पशुओं को नहलाएँ, उनके सींग सजाएँ और उन्हें गुड़ और बाजरा खिलाएँ। शहर में रहने वाले परिवार किसी गोशाला में जाकर गाय को भोजन करा सकते हैं।
- दान करें माध्व परंपरा में भगवान वामन की प्रसन्नता के लिए इस दिन गाय, वस्त्र या भूमि का दान किया जाता है। किसी ज़रूरतमंद को वस्त्र या भोजन देकर आप भी यह परंपरा निभा सकते हैं।
- दीपों की पंक्ति जलाएँ शाम ढलने पर घर की देहरी पर और पास के मंदिर में दीयों की पंक्तियाँ सजाएँ।
- मिलकर भोजन करें एक-दूसरे को उपहार दें और सब मिलकर त्योहार का भोजन करें।
बलि प्रतिपदा पूजा सामग्री
- सुबह के स्नान के लिए तिल का तेल
- पाँच रंगों की रंगोली
- बलि की मूर्ति के लिए गोबर या मिट्टी (वैकल्पिक)
- गेंदा और अन्य फूल
- कुमकुम
- हल्दी
- अक्षत (साबुत चावल)
- दही
- भोग के लिए फल और पका हुआ भोजन
- दीये, तेल और बाती
- अगरबत्ती
- पशुओं के लिए गुड़ और बाजरा
- नए वस्त्र
क्षेत्रीय परंपराएँ
- कर्नाटक
- बलींद्र पूजा से राजा का घर में स्वागत किया जाता है। द्वार पर बलि की आकृतियाँ बनती हैं और मंदिर दीपों से जगमगाते हैं।
- महाराष्ट्र
- यहाँ इसे पाडवा या दिवाली पाडवा कहते हैं। कई मराठी घरों में पत्नी अपने पति का औक्षण (आरती) करती है और पति उसे उपहार देता है।
- तमिलनाडु और कर्नाटक (किसान परिवार)
- कुछ किसान परिवार केदारगौरी व्रत और गौरम्मा पूजा करते हैं, जो दोनों माता पार्वती के रूपों की पूजा हैं। वे गोशाला की अच्छी तरह सफ़ाई करते हैं और अपनी गायों की पूजा करते हैं।
- हिमाचल प्रदेश
- यहाँ यह दिन बरलाज कहलाता है, जो 'बलि राज' का बिगड़ा हुआ रूप है। गाँव के लोग वामन के गीत गाते हैं और उस दिन खेतों में हल नहीं चलाते। कारीगर विश्वकर्मा का स्मरण कर अपने औज़ारों की पूजा करते हैं, और रसोई में चावल के आटे से एकलू बनाए जाते हैं।
- जम्मू
- यहाँ इसे बस राजा बलि कहा जाता है। महिलाएँ गेहूँ के आटे से बलि की मूर्तियाँ बनाती हैं, उनकी पूजा करती हैं और बाद में उन्हें जल में विसर्जित कर देती हैं।
- गुजरात और राजस्थान के कुछ भाग
- गुजरात में, और राजस्थान के कुछ समुदायों में, यही तिथि विक्रम संवत का नववर्ष, बेसतु वरस, होती है।
कर्नाटक में बलि पाड्यमी
कर्नाटक में बलि पाड्यमी दीपावली के मुख्य दिनों में से एक है। कन्नड़ परिवार राजा के धरती पर आगमन के उपलक्ष्य में बलींद्र पूजा करते हैं। रात में मंदिरों को रंगोली और दीपों की पंक्तियों से सजाया जाता है, और देवता का दूध से विशेष अभिषेक होता है।
गाँवों के घरों में गोबर से बलि की आकृति बनाकर उसे गेंदे के फूलों का मुकुट पहनाया जाता है। अक्सर यह आकृति त्रिकोण आकार की होती है और कोलम (रंगोली) से सजे पटरे पर रखी जाती है। कुछ परिवार आँगन में एक छोटा-सा किला भी बनाते हैं और राजा के स्वागत में उसके चारों ओर दीये जलाते हैं।
पशु भी इस उत्सव में शामिल होते हैं। अच्छी तरह नहलाने के बाद उनके सींग रँगे जाते हैं, गले में घंटियाँ और फूलों की मालाएँ पहनाई जाती हैं। उस दिन उन्हें गुड़ मिला सज्जे (बाजरा) खिलाया जाता है, जो साल भर खेती में साथ देने के लिए उनका आभार है।
बलि प्रतिपदा, दिवाली पाडवा और गुड़ी पड़वा
पड़वा या पाडवा शब्द प्रतिपदा से बना है, जो चंद्र मास के किसी भी पक्ष का पहला दिन होता है। इसीलिए एक से अधिक त्योहारों के नाम में यह शब्द आता है। महाराष्ट्र में बलि प्रतिपदा को पाडवा या दिवाली पाडवा कहा जाता है, और यह प्रायः लक्ष्मी पूजा के बाद आता है।
गुड़ी पड़वा एक अलग त्योहार है। यह मराठी और कोंकणी हिंदुओं का वसंत ऋतु का नववर्ष है, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन परिवार सजी हुई ध्वजा, यानी गुड़ी, फहराते हैं। दोनों त्योहारों में केवल पड़वा (पाडवा) शब्द साझा है, न ऋतु एक है, न रीति-रिवाज।
बलि की आकृति और रंगोली
बलि की आकृति बनाने की परंपरा पुरानी है। धर्मसिंधु के अनुसार बलि और उनकी पत्नी की आकृति भूमि पर पाँच रंगों के चूर्ण और फूलों से बनानी चाहिए। आज यह आकृति रंगोली, गोबर की मूर्ति या मिट्टी की प्रतिमा, किसी भी रूप में हो सकती है। कुछ माध्व परिवार बलि को आमंत्रित करते समय आकृति के सामने दही रखते हैं।
बलि प्रतिपदा की तिथियाँ
| दिन | तारीख |
|---|---|
| मंगलवार | 10 नवंबर 2026 |
| शनिवार | 30 अक्टूबर 2027 |
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बलि प्रतिपदा 2026 का समय क्या है?
बलि पूजा (प्रातःकाल): सुबह 6:43 – सुबह 8:52। समय दिल्ली के लिए IST में हैं।
बलि प्रतिपदा कब मनाई जाती है?
बलि प्रतिपदा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाती है। यह दीपावली का चौथा दिन है और प्रायः लक्ष्मी पूजा के बाद आती है।
क्या दिवाली पाडवा और गुड़ी पड़वा एक ही त्योहार हैं?
नहीं। दिवाली पाडवा ही बलि प्रतिपदा है, जो कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को आती है। गुड़ी पड़वा चैत्र मास में, वसंत ऋतु में आने वाला मराठी नववर्ष है।
राजा बलि कौन थे?
बलि, जिन्हें महाबली भी कहा जाता है, एक असुर राजा थे। वे प्रह्लाद के पौत्र और भगवान विष्णु के भक्त थे। उन्होंने वामन को तीन पग भूमि दान दी और पाताल लोक भेज दिए गए, पर उन्हें हर साल धरती पर आने का वरदान मिला।
बलि प्रतिपदा पर किसकी पूजा होती है?
इस दिन राजा बलि की पूजा अतिथि की तरह की जाती है। रंगोली से उनकी और रानी विंध्यावली की आकृति बनाई जाती है, या गोबर या मिट्टी से बलि की मूर्ति, और फूल, कुमकुम, अक्षत, दही और भोजन अर्पित किए जाते हैं। कई घरों में इसी दिन गायों की पूजा भी होती है।
कर्नाटक में बलि पाड्यमी कैसे मनाई जाती है?
परिवार बलींद्र पूजा करते हैं, गेंदे के फूलों से सजी गोबर या मिट्टी की बलि की आकृतियाँ रखते हैं और अपने पशुओं की पूजा करते हैं। रात में मंदिर दीपों और रंगोली से जगमगाते हैं।
दिवाली पाडवा पर पत्नियाँ क्या करती हैं?
कई मराठी घरों में पत्नी अपने पति का औक्षण, यानी आरती, करती है और बदले में पति उसे उपहार देता है। परिवार अक्सर नवविवाहित जोड़े का पहला पाडवा ख़ास तरीके से मनाते हैं।
क्या बलि प्रतिपदा का संबंध ओणम से है?
दोनों पर्व महाबली को समर्पित हैं और वामन की एक ही कथा से जुड़े हैं। ओणम केरल में अगस्त या सितंबर के आसपास मनाया जाता है, जबकि बलि प्रतिपदा दीपावली के दौरान आती है।


